August 27, 2026
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पत्रकारिता के लिए आज सबसे बड़ा संकट सत्ता और बाज़ार की जकड़न है: डॉ. मुकेश कुमार ख्यात पत्रकार व मीडिया शिक्षक डॉ. मुकेश कुमार से ख़ास बातचीत

पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट – डॉ. मुकेश कुमार भारतीय मीडिया जगत की एक प्रतिष्ठित हस्ती हैं। लगभग चार दशक के करियर में उन्होंने अख़बार, टीवी और डिजिटल मीडिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। एंकर, स्तंभकार, लेखक, कवि, शिक्षाविद और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ—हर भूमिका में उनका काम उल्लेखनीय रहा है।

वर्तमान में वे Satyahindi.com के एडिटर हैं, जिसके यूट्यूब चैनल के 32 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं। उनका दैनिक शो और ‘ताना-बाना’ व ‘सच का सामना’ जैसे कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हैं। इससे पहले वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, एसजीटी यूनिवर्सिटी और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों में डीन और प्रोफेसर रहे।

उन्होंने भारतीय न्यूज़ इंडस्ट्री में बड़ा योगदान दिया है और न्यूज़ एक्सप्रेस, सहारा समय, S1, VOI और मौर्या टीवी जैसे छह बड़े चैनलों के लॉन्च में अहम भूमिका निभाई। दूरदर्शन पर सुबह-सवेरे, फ़िलहाल, कही अनकही, आपकी बैठक के अलावा अन्य चैनलों पर ‘राजनीति–खेल सत्ता का’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘बात बोलेगी’ जैसे कार्यक्रमों की एंकरिंग ने उन्हें खास पहचान दिलाई। वे दूरदर्शन की पहली राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका ‘परख’ के एडिटोरियल चीफ भी रहे।

लेखन और रचना के क्षेत्र में भी उनकी 14 प्रकाशित पुस्तकें और कई डॉक्यूमेंट्री-टेलीफिल्में शामिल हैं। उनका कविता संग्रह ‘साधो जग बौराना’ को व्यापक सराहना मिली है।

मीडिया, साहित्य और शिक्षा में उनका अनुभव नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। मीडिया के बदलते परिदृश्य और पत्रकारिता की चुनौतियों पर रईस अहमद ‘लाली’ से हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:

आपने पत्रकारिता का सफर कैसे शुरू किया? शुरुआती चुनौतियाँ क्या रहीं?

  • विज्ञान में मास्टर डिग्री लेने के बाद सवाल उठा कि अब क्या…..एक स्थानीय अख़बार ‘दैनिक समय’ को प्रशिक्षु पत्रकारों की ज़रूरत थी। लेखन का सिलसिला बहुत पहले शुरू हो चुका था और पत्र-पत्रिकाओं से वास्ता बना हुआ था, लिहाज़ा ये एक तरह से अपनी रुचि का विस्तार था। तीन महीने ही हुए थे कि मेरे एक शिक्षक ने कहा कि पत्रकारिता का कोर्स कर लो और मैं सागर यूनिवर्सिटी पहुँच गया कोर्स करने। वहीं देशबंधु अख़बार समूह से अंशकालिक संवाददाता बनने का ऑफर आया और मैं पढ़ाई के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी करने लगा। बस यही शुरुआत थी।

लगभग चार दशक के मीडिया करियर में आपको कौन-से महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले?

  • बदलाव तो ढेरों हुए हैं और बहुत बड़े हुए हैं। उन पर एक नहीं कई क़िताबें लिखी जा सकती हैं। लेकिन अगर मोटे तौर पर आप कहें तो पहला बदलाव तो ये हुआ कि मीडिया का पूरा चरित्र ही बदल गया। पहले सरोकारी पत्रकारिता का बोलबाला था। सरोकार विहीन पत्रकार को पत्रकार ही नहीं माना जाता था, मगर अब सरोकार बहुत बुरा शब्द हो गया है। प्रबंधक या मीडिया संस्थान इस शब्द से ही चिढ़ते हैं। वे ऐसे पत्रकार चाहते हैं जो उनके धंधे के विस्तार में मदद करें। वे बाज़ारोन्मुखी हो गए हैं, मार्केट फ्रैंडली हो गए हैं। वे अपने टारगेट ग्रुप के लिए कंटेंट बनाते हैं।

इसी के साथ-साथ वे सत्ता के साँचे में पूरी तरह से ढल गए हैं। उन्हें ख़बरों, पत्रकारिता, मीडिया की स्वतंत्रता, समाज, लोकतंत्र वगैरह से कुछ भी लेना देना नहीं है। वे सत्ता के हर नाजायज़ काम को जायज़ ठहराने के लिए तैयार बैठे हैं। इसके पीछे उनकी स्वेच्छा भी है और डर भी। मगर स्थितियाँ विकट हैं। अच्छी पत्रकारिता के लिए जगह बहुत कम बची है।

दूसरा, बड़ा परिवर्तन तकनीक के स्तर पर आया है। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो चंद अख़बार थे और एकमात्र टीवी चैनल दूरदर्शन। लेकिन इस समय देश में क़रीब नौ सौ चैनल हैं और उनमें से साढ़े तीन सौ के आसपास न्यूज़ चैनल। इंटरनेट के आगमन ने मीडिया का और विस्तार किया है। मोबाइल के ज़रिए वह हर समय आपके साथ है। लोग पहले के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा मीडिया कंज्यूम कर रहे हैं।

लेकिन अगर मीडिया की गुणवत्ता की बात करेंगे, पत्रकारिता की बात करेंगे तो वह बहुत नीचे गिर गया है। इतना नीचे कि पत्रकारिता की आचरण संहिता की धज्जियाँ उड़ा रहा है।

टीवी और डिजिटल मीडिया—दोनों में आपने मजबूत भूमिका निभाई। आपके अनुसार दोनों का सबसे बड़ा अंतर क्या है?

  • टीवी आपके साथ नहीं जा सकता, मगर डिजिटल मीडिया मोबाइल के ज़रिए आपके साथ हर जगह मौजूद है। यानी आप हर समय कनेक्टेड हैं। आप किसी भी समय कुछ भी देख सकते हैं। हालाँकि टीवी भी अब मोबाइल के ज़रिए आप तक पहुँच रहा है, उसका कंटेंट तो पहुँच ही रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि विजुअल या वीडियो हमारी दुनिया पर छा गए हैं। हम पढ़ने से ज़्यादा देखने लगे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बढ़ते व्यवसायीकरण का पत्रकारिता की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ा है?

  • इसका ज़िक्र मैंने पहले सवाल के जवाब में किया है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से बाज़ार का अंधाधुंध विस्तार हुआ है और उसका सीधा हमला मीडिया कंटेंट पर पड़ा है। वह सतही और सनसनीखेज़ हुआ है। बाज़ारीकरण की वज़ह से संपादक नामक संस्था ख़त्म हो गई है और उसकी जगह प्रबंधन ने ले ली है। वही सब कुछ कंट्रोल कर रहा है। फिर मीडिया का कार्पोरेटाइजेशन भी हुआ है, जिससे बड़ी पूँजी ने मीडिया का कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया है। कार्पोरेट की सत्ता के साथ मिलीभगत है और दोनों मिलकर मीडिया का इस्तेमाल अपने स्वार्थों के लिए कर रहे हैं। इसीलिए हम पाते हैं कि मीडिया लोकतंत्र-विरोधी और जन-विरोधी हो चुका है। वह नफ़रत, हिंसा और तमाम तरह के विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

जनता के मुद्दे और TRP—आपकी नज़र में पत्रकारों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

  • अगर मुख्यधारा में पत्रकारों की बात करेंगे तो उनके हाथों में कुछ रह नहीं गया है। उन्हें तो वही करना होगा जो सत्ता और उनका मालिक चाहेगा। उसमें थोड़ी-बहुत गुंज़ाइश निकाली जा सकती है, मगर इतनी नहीं कि कार्पोरेट लूट और सत्ता की धांधलियों के ख़िलाफ़ कुछ कहा जा सके। हाँ, वैकल्पिक मीडिया ने नई खिड़कियाँ खोली हैं, जहाँ पत्रकार खुलकर बोल भी रहे हैं और नए-नए प्रयोग भी कर रहे हैं। तो प्राथमिकता पत्रकारों को तय करना है कि वे क्या करना चाहते हैं। अगर मुख्यधारा के मीडिया में रहेंगे तो टीआरपी के हिसाब से ही चलना होगा।

पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट आज का हिंदी न्यूज मीडिया कितनी हद तक स्वतंत्र और निष्पक्ष है?

  • इसका जवाब मैं पहले के सवालों में दे चुका हूँ।

सरकार और मीडिया के संबंधों को लेकर आपकी क्या राय है? क्या दबाव पत्रकारिता को प्रभावित कर रहे हैं?

  • सरकार और मीडिया अब अलग नहीं रह गए हैं। मीडिया अब सत्ता के प्रोपेगंडा का टूल भर रह गया है। उसका कंटेंट पूरी तरह से सत्ता-पक्ष की ओर झुका हुआ है। जब मैं सत्ता-पक्ष कहता हूँ तो उसका मतलब शासक वर्ग से है और उसमें सरकार, कार्पोरेट, उच्च वर्ग और उच्च वर्ण सब शामिल हैं।

एक एडिटर की भूमिका आज पहले के मुकाबले कैसे बदली है?

  • गोदी मीडिया में संपादक नहीं हैं, मैनेजर हैं। वे चैनल को सत्ता और अपने मालिकों के फ़ायदे के लिए मैनेज कर रहे हैं बस। इसलिए उनकी भूमिका आप समझ सकते हैं। स्वतंत्र मीडिया में ज़रूर उनकी भूमिका है और वह बेहद सार्थक भी है।

आज की पत्रकारिता पर पक्षपात के जो आरोप लगते हैं, आप उन्हें कैसे देखते हैं?

  • पूरी तरह से सही हैं और ये बात तो अब पूरा देश, पूरी दुनिया जानती है। कोई बच्चा भी बता देगा कि मीडिया क्या कर रहा है। उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है। वह केवल मनोरंजन के लिए देखा जाता है और जनमत निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

सोशल मीडिया के दौर में फेक न्यूज की बाढ़ ने मीडिया की विश्वसनीयता को कितना नुकसान पहुँचाया है?

  • बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुँचाया है और डीप फेक की वज़ह से ये नुक़सान बढ़ता जा रहा है। कई बार तो लोगों को समझ में ही नहीं आता कि ख़बर सही है या झूठ। हमारे देश में मीडिया लिट्रेसी ज़ीरो है। लोगों को पता ही नहीं है कि वे कैसे किसी ख़बर को जाँचें-परखें, मीडिया कंटेंट का कैसे इस्तेमाल करें। ऐसे में ख़तरे और भी बढ़ जाते हैं।

फेक न्यूज़ और प्रोपेगेंडा के समय में विश्वसनीय कंटेन्ट कैसे बनाया जा सकता है?

  • लोग बना रहे हैं। पत्रकारिता के बुनियादी सिद्दांतों को पालन करके बनाया जा सकता है। तथ्यों की अच्छे से पड़ताल करके, विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी जुटा के ये काम किया जा सकता है। ये इतना मुश्किल भी नहीं है, लेकिन सवाल उठता है कि आप में उतना धैर्य और कमिटमेंट है या नहीं।

लोकतंत्र की मजबूती में मीडिया की आज क्या भूमिका होनी चाहिए?

  • लोकंतंत्र में मीडिया को चौथा खंभा माना जाता है, मगर जो हालत बाक़ी तीनों खंभों की हुई है वही उसकी भी। इसलिए वह अपनी भूमिका नहीं निभा रहा है। होना तो ये चाहिए कि वह सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए उससे मुश्किल सवाल पूछे, मगर सब उसके क़दमों में बिछ रहे हैं।

मीडिया जनता और सत्ता के बीच संतुलन कैसे बनाए रख सकता है?

  • संतुलन के फेरे में नहीं पड़ना चाहिए। ऑब्जेक्टिव पत्रकारिता, जन-सापेक्ष पत्रकारिता, ग़रीबों, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों के मुद्दों की पत्रकारिता करते जाइए, संतुलन की परवाह मत कीजिए।

यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आपका शो बेहद चर्चित है। दर्शकों की यह लोकप्रियता आपको किस तरह प्रेरित करती है?

  • मेरा हमेशा से ये ध्येय रहा है कि अच्छी सामग्री को रोचक ढंग से पेश करूँ। इसमें कभी सफलता मिलती है, कभी नहीं, मगर मैं अपनी राह पर चलता रहता हूँ। परवाह नहीं करता कि टीआरपी नहीं आई या व्यूज़ नहीं आए। अपने काम पर फोकस करके लगे रहो यही मेरा मूल मंत्र है।
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