September 2, 2026
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कर्ज में डूबता अमेरिका

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और वैश्विक राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकतों में से एक—अमेरिका। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसी आर्थिक चुनौती खड़ी है, जिसे नजरअंदाज करना अब आसान नहीं है। अमेरिका का कुल संघीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है।

18 अगस्त 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी के आंकड़ों में कुल संघीय कर्ज करीब 40.05 ट्रिलियन डॉलर दर्ज किया गया। यह रकम इतनी बड़ी है कि इसे समझने के लिए सिर्फ डॉलर में लिखी संख्या काफी नहीं। इसके पीछे वर्षों से बढ़ता सरकारी खर्च, लगातार बजट घाटा, कोरोना महामारी के दौरान किया गया भारी खर्च और कर्ज पर बढ़ता ब्याज खर्च है।

लेकिन क्या 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज अमेरिका को आर्थिक संकट की तरफ ले जा रहा है? या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अभी भी इस बोझ को संभालने की स्थिति में है?

यही इस समय सबसे बड़ा सवाल है।

40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज आखिर है क्या?

अमेरिकी सरकार का कुल संघीय कर्ज दो बड़े हिस्सों में बंटा है। इसमें करीब 32.27 ट्रिलियन डॉलर वह कर्ज है जो जनता, निवेशकों और संस्थानों के पास मौजूद अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में है। दूसरा हिस्सा करीब 7.78 ट्रिलियन डॉलर का है, जो सरकार की अलग-अलग संस्थाओं के बीच मौजूद है।

सरल भाषा में समझें तो अमेरिकी सरकार वर्षों से अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करती रही है। जब सरकारी आय खर्च से कम पड़ती है तो उस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है। यही उधारी धीरे-धीरे राष्ट्रीय कर्ज का हिस्सा बनती जाती है।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब हर साल का घाटा पुराने कर्ज के ऊपर नया कर्ज जोड़ता रहता है।

एक दशक में लगभग दोगुना हुआ कर्ज

अमेरिका के कर्ज की रफ्तार को समझने के लिए 2017 का आंकड़ा काफी अहम है। जनवरी 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के पहली बार राष्ट्रपति बनने के समय अमेरिका का कुल संघीय कर्ज करीब 19.95 ट्रिलियन डॉलर था।

आज यह 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है।

यानी दस साल से भी कम समय में अमेरिकी सरकार का कुल कर्ज लगभग दोगुना हो गया।

इस दौरान अमेरिका ने एक के बाद एक बड़े आर्थिक झटकों का सामना किया। इनमें सबसे बड़ा झटका कोरोना महामारी था। महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था को चलाए रखने, बेरोजगार लोगों की मदद करने और कंपनियों को राहत देने के लिए अमेरिकी सरकार ने बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया।

लेकिन कहानी सिर्फ कोरोना तक सीमित नहीं है।

कर्ज की जड़ें कोरोना से कहीं पुरानी हैं

अमेरिका में सरकारी कर्ज की समस्या महामारी से पहले भी मौजूद थी। वर्षों से सरकार की आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।

सरकार को Social Security, Medicare, Medicaid, रक्षा, पूर्व सैनिकों की सुविधाओं और दूसरी योजनाओं पर भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। दूसरी तरफ टैक्स से आने वाला राजस्व इन खर्चों की पूरी भरपाई नहीं कर पाता।

इसके अलावा अलग-अलग समय पर टैक्स में कटौती और नई सरकारी योजनाओं पर खर्च ने भी घाटे को बढ़ाया है।

इसलिए 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज किसी एक राष्ट्रपति या किसी एक सरकार की कहानी नहीं है। यह कई वर्षों से बनती आ रही आर्थिक समस्या का नतीजा है।

ट्रंप से बाइडेन और फिर ट्रंप तक

अमेरिकी कर्ज पर राजनीतिक बहस अक्सर इस सवाल के आसपास घूमती है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका का कुल संघीय कर्ज करीब 7.8 ट्रिलियन डॉलर बढ़ा। इस दौरान कोरोना महामारी आई और सरकार को बड़े पैमाने पर आर्थिक राहत पैकेज देने पड़े।

इसके बाद जो बाइडेन राष्ट्रपति बने। उनके चार साल के कार्यकाल में कुल संघीय कर्ज करीब 8.4 ट्रिलियन डॉलर बढ़ा। कोरोना के बाद आर्थिक सहायता के अलावा बुनियादी ढांचे, स्वच्छ ऊर्जा और दूसरी योजनाओं पर भी सरकार ने बड़ी रकम खर्च की।

जनवरी 2025 में ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने। उनके दूसरे कार्यकाल में भी अमेरिकी कर्ज बढ़ना जारी है।

यह आंकड़े एक महत्वपूर्ण बात बताते हैं—अमेरिकी कर्ज की समस्या किसी एक पार्टी की समस्या नहीं है।

राष्ट्रपति बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन खर्च और आय के बीच का अंतर बना रहा।

असली खतरा कर्ज नहीं, कर्ज पर ब्याज है

40 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा डराने वाला जरूर है, लेकिन अर्थशास्त्रियों के लिए इससे भी बड़ी चिंता कर्ज पर बढ़ता ब्याज खर्च है।

अमेरिकी सरकार को अपने पुराने कर्ज पर हर साल भारी रकम ब्याज के रूप में चुकानी पड़ती है। वित्त वर्ष 2026 में शुद्ध ब्याज भुगतान 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक रहने का अनुमान है।

CBO के मुताबिक, आने वाले वर्षों में यह खर्च और बढ़ सकता है। 2036 तक अमेरिकी सरकार का शुद्ध ब्याज खर्च करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

यह सिर्फ एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है। इसका सीधा मतलब है कि सरकार की कमाई का ज्यादा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाएगा।

यानी सरकार के पास नई योजनाओं, बुनियादी ढांचे, शिक्षा या दूसरी जरूरतों के लिए पैसा खर्च करने की गुंजाइश कम हो सकती है।

बुजुर्ग आबादी भी बढ़ा रही है दबाव

अमेरिका की अर्थव्यवस्था के सामने एक और बड़ी चुनौती है—बढ़ती उम्र की आबादी।

Social Security और Medicare जैसी योजनाओं पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है। जैसे-जैसे बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी, इन योजनाओं पर खर्च का दबाव भी बढ़ सकता है।

यही वजह है कि अमेरिकी सरकार के लिए कर्ज की समस्या केवल आज के घाटे को कम करने का मामला नहीं है। उसे आने वाले 10, 20 और 30 वर्षों की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर फैसला करना होगा।

लेकिन Social Security और Medicare जैसी योजनाओं में कटौती राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इसलिए खर्च कम करना जितना आसान कागज पर दिखाई देता है, जमीन पर उतना ही मुश्किल है।

क्या अमेरिका दिवालिया हो सकता है?

यह सवाल इन दिनों सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। लेकिन 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज को देखकर सीधे यह कहना कि अमेरिका दिवालिया होने वाला है, सही नहीं होगा।

अमेरिका की स्थिति दूसरे देशों से अलग है। डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को वैश्विक वित्तीय बाजार में महत्वपूर्ण सुरक्षित निवेश माना जाता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार भी बहुत बड़ा है।

इसलिए अमेरिका के पास कर्ज संभालने की क्षमता कई दूसरे देशों की तुलना में अधिक है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि कर्ज की कोई सीमा नहीं है।

अगर सरकार लगातार अपनी आय से ज्यादा खर्च करती रही और ब्याज का बोझ बढ़ता गया, तो भविष्य में आर्थिक फैसलों के लिए सरकार की आजादी कम हो सकती है।

दुनिया पर भी पड़ेगा असर

अमेरिका का आर्थिक संकट केवल अमेरिका की समस्या नहीं होगा।

अमेरिकी ट्रेजरी बाजार और डॉलर का वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़ा महत्व है। दुनिया के कई देश और संस्थान अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में निवेश करते हैं।

अगर अमेरिकी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंता बढ़ती है या अमेरिकी सरकार को कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ता है, तो इसका असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।

ब्याज दरों में बदलाव से कंपनियों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है। घर खरीदने वाले लोगों, कारोबारों और निवेशकों पर भी इसका असर पड़ सकता है।

भारत जैसे देशों के लिए भी अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ब्याज दरों में बड़े बदलाव महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनका असर विदेशी निवेश, रुपये की कीमत, आयात लागत और वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है।

क्या रास्ता बचा है?

अमेरिका के सामने रास्ते बहुत स्पष्ट हैं, लेकिन आसान नहीं।

सरकार को अपनी आय बढ़ानी होगी, खर्च नियंत्रित करना होगा या दोनों कदम एक साथ उठाने होंगे। लेकिन टैक्स बढ़ाना राजनीतिक रूप से मुश्किल है। Social Security और Medicare जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में कटौती करना भी आसान नहीं है। रक्षा और दूसरी बड़ी सरकारी योजनाओं पर खर्च कम करने का भी अपना राजनीतिक और रणनीतिक असर होगा।

यही अमेरिका की सबसे बड़ी वित्तीय चुनौती है।

कर्ज बढ़ाना आसान है, लेकिन उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल।

40 ट्रिलियन डॉलर सिर्फ एक संख्या नहीं

अमेरिका का 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज किसी तत्काल आर्थिक पतन की घोषणा नहीं है। लेकिन यह एक बड़ा संकेत जरूर है।

यह संकेत बताता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी असीमित खर्च नहीं कर सकती। आज लिए गए कर्ज का भुगतान आने वाली पीढ़ियों को करना होगा। और अगर ब्याज का खर्च लगातार बढ़ता रहा तो सरकार के बजट पर दबाव भी बढ़ता जाएगा।

अमेरिका के सामने अब असली चुनौती यह नहीं है कि वह 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज को कैसे संभाल रहा है। असली सवाल यह है कि 50 ट्रिलियन डॉलर की ओर बढ़ने से पहले वह अपनी वित्तीय स्थिति को कितना सुधार पाता है।**

दुनिया की निगाहें अब इसी पर हैं।

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