• डॉ. सुधीर सक्सेना
पड़ोसी राष्ट्र नेपाल को पुन: हिन्दु राष्ट्र घोषित करने की माँग दिनों-दिन बलवती होती जा रही है। हाल में नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटे पार्टी के वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देऊबा के ताजा बयान ने एतदविषयक ठंडे हो चुके आंदोलन के अलाव में छिपटियां डालने का काम किया है। गौरतलब है कि देऊबा पांच बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और उन्हें सेक्युलरिज्म़ का ध्वजवाहक माना जाता रहा है। ऐसे में बिना किसी औपचारिकता के यकबयक दक्षिण-पूर्व एशिया से स्वदेश-वापसी पर अपने गुट की राष्ट्रीय बैठक में उसी एजेंडे को उनकी मंजूरी विस्मयकारी है, जिसे अतीत में वह खारिज करते रहे हैं।
पुराने रिकार्ड को खँगालें तो सन 2015 की संवैधानिक बहसों और सन 2018 और 2024 की महासमिति की बैठकों में देऊबा ने सैकड़ों सदस्यों के हस्ताक्षरित ज्ञापन और मांग को सिरे से अमान्य कर दिया था, जिसमें संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता से हटने की मांग की गई थी। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने पर डायचेवेले को इंटरव्यू में इस बारे में प्रश्न पर वह बिफर गये थे और उन्होंने दो टूक कहा था कि नेपाल धर्मनिरपेक्षता के मार्ग पर अग्रसर रहेगा और नेपाली कांग्रेस की भी यही नीति है। पीएम रहते हुये उन्होंने बारंबार चेतावनी दी थी कि धर्मनिरेक्षता को पलटने से समाज में बँटवारा होगा और संकट सघन होगा।
नेपाल में राजशाही बनाम लोकशाही और हिंदु राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता का द्वंद्व पुराना है। नेपाली कांग्रेस की धर्मनीति बदलती रही है, अलबत्ता कांग्रेस के संस्थापक और प्रथम प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोईराला की दृढ़मान्यता थी कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन व्यक्ति (नागरिक) का धर्म होता है। राजशाही के दौर में कांग्रेस ने राजतंत्र के अंतर्गत बहुलवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन किया और सन 2006-07 में धर्म-निरपेक्षता को अंगीकार करने में उसकी नाभिकीय भूमिका रही। देऊबा के बयान से यक्ष प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि क्या वह हिंदु राष्ट्र के साथ-साथ राजशाही के तहत बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी बहाली चाहते हैं।
इसमें शक नहीं कि नेपाल के हिंदुत्व और राजतंत्र की ओर वापसी में खतरे सन्निहित हैं। वहां बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई, किरात और मधेशी जैसे धार्मिक एवं जातीय अल्पसंख्यक समुदाय हैं। किसी एक धर्म को राजकीय प्रश्रय से उसमें श्रेष्ठता का निरंकुश अहंकार व्यापता है तथा अन्य के साथ उनका सलूक निर्मम व कठोर हो जाता है। 18 मई, 2006 को जब नेपाल सेक्युलर राष्ट्र बना, तब कंग्रेस के गिरिजा प्रसाद कोइराला पीएम थे। आश्चर्य की बात है कि हिन्दु राष्ट्र की बहाली के अभियान में खुम बहादुर खड़का और शंकर भंडारी के साथ-साथ कोईराला परिवार के डॉ. शशांक कोईराल भी शरीक हैं। और तो और, सिने अभिनेत्री मनीषा कोईराल भी राजतंत्र और हिंदु राष्ट्र की हिमायती हैं। नेपाली समाज जुलाई 26 में कोसी प्रांत के सुनसरी जिले में देवगंज में धार्मिक उपद्रव को भूला नहीं है।
ऐसे में जहां तक देऊबा के यू टर्न की बात है, माना जा रहा है कि वह इसके जरिये सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं। गत वर्ष सत्ता परिवर्तन के दौर में देऊबा और उनकी राजनीतिज्ञ पत्नी डॉ. आरजू राणा के आवास पर हमला हुआ था। अप्रैल 26 में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ, जिस पर मई में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी थी। अंतराष्ट्रीय मामलों और भारत-नेपाल संबंधों के विशेषज्ञ पुष्परंजन मानते हैं कि देऊबा का यू टर्न चिंताजनक है और यह बोतल से जिन्न निकालने सरीखा है। देऊबा दंपत्ति मनी लांडरिंग के आरोपों की जांच से बचना चाहते हैं। नेपाल में शांति और विकास के लिए सेक्यूलरिज्म और लोकतंत्र जरूरी शर्त है। वह इसे दक्षिण-पूर्व एशिया में जिओ पालीटिक्स से जोड़कर देखते हैं। नेपाल पर भारत का असर स्वाभाविक है। जहां तक धर्मतंत्र को प्रश्रय का प्रश्न है, पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिंदुओं, म्यांमार में रोहिंग्याओं, श्रीलंका में तमिलों को अपूर्व संकटों का सामना करना पड़ा है। भारत में भी बीती दहाई में सामाजिक – सांस्कृतिक समीकरणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।


Leave a Comment